एक परिवार की दोनों बेटियां बनी साध्वी, रो-रो कर माँ-बाप का हुआ बुरा हाल, फिर जो हुआ देख सबकी आँखों से छलके आंसू

एक परिवार की दोनों बेटियां बनी साध्वी, रो-रो कर माँ-बाप का हुआ बुरा हाल, फिर जो हुआ देख सबकी आँखों से छलके आंसू

दोस्तो बेटी के जन्म से ही माता पिता की आंखों में उसकी शादी को लेकर बहुत से सपने होते है । बेटी के बड़े होने के साथ साथ वो सपने भी बड़े होते रहते है आखिरकार वो समय भी जल्दी ही आ जाता है जब माता पिता अपने बरसो के सपने को पूरा करे ।लेकिन उस समय उन माता पिता के दिल पर क्या गुजरेगी जब उनकी बेटी शादी से इन्कार कर दे।

आज हम आपको ऐसी ही बेटियो के बारे में बताएंगे जिन्होंने अपने माता पिता का सपना तोड़ चुना ये रास्ता कि माता पिता की आंखों से आंसू थमने का नाम ही नही ले रहे है । एक परिवार कि दो बेटियों ने शादी की उम्र में सब छोड़ कर दीक्षा ले ली है.जैसे ही उन्होंने ये सब करने के बारे में फैमिली को बताया तो दोनों के माता-पिता के आंसू निकल गए.

घर वालों ने दुल्हन की तरह बेटियों को सजाया. खूब दुलार कर हमेशा के लिए विदा किया. दीक्षा के बाद साध्वियां ने कहा कि भगवान आदिनाथ के साथ वैलेंटाइन-डे मनाने के लिए संयम पथ पर अग्रसर हो चुकी है.इस परिवार की दोनों बेटियों के अनुसार आठों कर्मों की बेड़ियां तोड़ मोक्ष गति को प्राप्त करना ही उनका जीवन का लक्ष्य हैं.

दोनों ने जैन संतों और हजारों लोगों की मौजूदगी में सोमवार शाम को परिवार का त्याग कर दिया था. मनोज और सीमा लोढ़ा ने अपनी 21 साल की बेटी को विदा किया. गले लगकर पीनल को रोते हुए खूब दुलार किया.पाली के देवजी के बास में रहने वाले मनोज लोढ़ा की बेटी ने संयम पथ अपनाया है. 21 साल की पीनल लोढ़ा ने गुजरात के शंखेश्वर तीर्थ में जैन संतों के सान्निध्य में दीक्षा ली हैं.

अपने परिवार से हमेशा-हमेशा के लिए उसे विदा कर दिया. इसके बाद दीक्षा की रस्में हुईं. लाल जोड़े में सजी पीनल ने सफेद वस्त्र धारण किए और केश लोचन किया गया. पीनल को दुल्हन की तरह सजाकर शंखेश्वर तीर्थ लाया गया. इस दौरान पीनल खुशी से नाचने लगी और कहने लगी मुझे इस संयम पथ पर आगे चलने की आज्ञा दे. घर में ख़ुशी के साथ-साथ गम का भी माहौल था उनके घर की लाड़ली हमेशा के लिए सांस्कारिक माहौल से दूर जा रही थी। माँ-बाप ने बेटी को गले लगाकर खूब सहराया।

पीनल ने बीए सैकेंड ईयर तक पढ़ाई की है. शुरू से ही धार्मिक कार्यक्रमों में जाती रही थी. ग्रंथों को पढ़ने का भी हमेशा से शौक रहा था. जैन साधु-संतों के प्रवचन सुन मन में भी वैराग्य धारण करने की भावना जागी. अपनी इच्छा से पापा मनोज और मम्मी सीमा लोढ़ा को बताया था. उन्होंने साथ दिया और दीक्षा लेने की आज्ञा दी थी.और खुद ख़ुशी-ख़ुशी अपनी बेटी को विदा कर दिया।

 

 

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